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क्या हम केंद्र शासित राजधानी चाहते हैं या पूर्ण राज्य ?

170815 Full Statehood Blog

क्या हम केंद्र शासित राजधानी चाहते हैं या पूर्ण राज्य ?

दिल्ली वासियों पर हमेशा यह प्रश्न थोपा जाता है कि वह क्या केंद्र शासित राजधानी के रूप मे प्रशासन चाहते हैं या पूर्ण राज्य का दर्जा पाकर अपने आप को शासित करना चाहते हैं ।

यह प्रश्न पिछली सदी के प्रारंभ से ही उच्च स्तीरिय स्तर पर वाद-विवाद का विषय रहा है । जब 1912 में भारत की राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली अंग्रेज लेकर आए थे । उस समय पर “जो फैसला हुआ था उसे सभी ने मान्यता दी थी ।“

25 अगस्त 1911 को भारत सरकार ने अपने सचिव को जो टिपण्णी दी थी उसमे उस विषय पर कहा था कि उस महान केंद्रीय सरकार की राजधानी स्वतंत्र व अलग होनी चाहिए और उसके शासन की व्यवस्था अमरीका, कनाड़ा व ऑस्ट्रेलिया के सिद्दान्तों के अनूरूप होनी चाहिए ।

यह सिर्फ ब्रिटिश सरकार की ही राय नहीं थी बल्कि संविधान बनाने की जो कमेटी बनी थी उसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दिल्ली को “पार्ट-सी” में रखा था। जिसमें कानून व्यवस्था, स्थानीय निकायों, दिल्ली इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (1937) (आज का दिल्ली विकास प्राधिकरण) और सांविधिक संस्थाऐं जो कि जन सुविधाओं का संचालन, दिल्ली और नई दिल्ली के लिए करेंगी, उन्हे उससे अलग रखा जाएगा ।

1955 मे जब राज्य पुर्नगठन आयोग ने उस पर विचार किया तो उसने मुख्यमंत्री तथा विधान सभा के प्रावधान को रद्द कर दिया । उसके प्रशासनिक अधिकारों को सीमित करते हुए दिल्ली मे नगर निगम और उसे चलाने के लिए महापौर की एक समिति का गठन किया । अर्न्तराष्ट्रीय प्रथा को ध्यान मे रखते हुए उसने कहा कि यदि यह राजधानी बनी रहती है तो हम उसे संघीय ढांचे का पूर्ण अधिकारों वाली ईकाई नहीं बना सकते…. फ्रांस का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ पर केंद्रीय सरकार को पैरिस पर अधिक नियंत्रण व अधिकार प्राप्त है जो अन्य नगर-निगम के मुकाबले कही अधिक है । आगे कहा कि इंग्लैंड में लंदन के महानगरीय क्षेत्र पर पुलिस प्रशासन का अधिकार गृह सचिव को है जो कि उसे अन्य महानगरों पर प्राप्त नहीं है । राजधानी राष्ट्रीय सरकार की कुर्सी है, वहाँ की सम्पत्ति उनकी है, विदेशों के राजदूतावासों और अर्न्तराष्ट्रीय संस्थाओं का केंद्र है । जब हम देश की राजधानी विषय पर उसके अधिकारों को कम करते हैं तो शर्मनाक स्थितियाँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है । दूसरे देशों में प्रशासनिक जरूरतों और असमानता के अधार पर उत्पन्न होने वाले विवादों को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि प्रभावी नियॆत्रण केंद्र सरकारों को केंद्र की राजधानियों को दिया जाए । राजनेताओं के स्पष्ट विरोध और अधिक अधिकारों की इच्छाओं के कारण केंद्र सरकार ने 1966 मे दिल्ली प्रशासनिक एक्ट के माध्यम से दिल्ली महानगर परिषद् दी । जिसमे मुख्य कार्यकारी पार्षद और महानगरी पार्षद होते थे न कि, मुख्यमंत्री और विधायक दिये।

यह परिषद विधायक के अधिकारों से वंचित थी और सिर्फ वाद-विवाद तक सीमित थी । जिस प्रथम महानगरीप परिषद के डॉ. लाल कृष्ण अडवाणी अध्यक्ष चुने गए थे ।

माननीय न्यायधीश सरकारिया आयोग (जिसे बाद मे बाल कृष्ण कमेटी) ने 1989 मे रिपोर्ट दी थी, उसके आधार पर आज विधान सभा का स्वरूप है । इस कमेटी ने भी पहले से प्रकट किए गए विचारों को सही ठहराया और पुलिस, कानून व्यवस्था तथा भूमि को दिल्ली सरकार को न देने के लिए सिफारिश की । उसने अर्न्तराष्ट्रीय प्रथाऐं तथा राष्ट्रीय राजधानी और उसमे उत्पन्न होने वाले दोहरी अधिकारों के विवादों को अपनी सिफारीश के आधार बनाया था ।

यदि आप देश मे किसी से भी पूछें तो, दिल्ली सभी भारत के महानगरों में तुलनात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ है । जैसे बुनियादी ढांचों, हरियाली व सड़कों में । यह सब कुछ हमने पाया है वर्तमान व्यवस्था में। यदि हम पूर्ण राज्य की ईकाई बनें तो हम वित्तीय दृष्ति से यह स्वांवलम्बी नहीं होंगे। उप मुख्यमंत्री ने लेखा अनुदान पर बोलते हिए कहा कि राज्य को 5000 करोड़ रूपए मिलेंगे जो उसका हिस्सा होगा जिसे केंद्र सरकार ने करों के रूप में इकठ्ठा किया है। अर्थात पांच वर्षों मे 25000 करोड़ रूपए। परंतु उन्होने यह नहीं बताया कि सिर्फ दिल्ली पुलिस का बजट केंद्र सरकार ने 5200 करोड़ रूपए रखा है । इसके अलावा दिल्ली मे पाँच सर्वश्रेष्ठ अस्पताल हैं । जिनका सम्पूर्ण खर्चा केंद्र सरकार वहन करता है । इस वर्ष इन अस्पतालों का बज़ट 3200 करोड़ रूपए के आसपास है । मेट्रो रेल पर 2011 तक केंद्र सरकार ने 6500 करोड़ रूपए खर्च किया है । इसके अलावा केंद्र सरकार ने जापानी सस्ते दरों पर लिए गए कर्ज की पूरी ज़मानत दी है । दिल्ली विश्वविध्यालय अनुदान आयोग तीन केंद्रीय विश्वविघालयों को पूंजी देता है । दिल्ली वासियों को उपरूक्त केंद्रीय अनुदानों की जानकारी भी मुहैया करानी चाहिए। जिससे वह निर्णय लेने की प्रक्रिया मे इन केंद्र बिन्दुओं का विश्लेषण कर सकें ।

हम देखतें हैं कि राष्ट्रीय राजधानी और पूर्ण राज्य का दर्जा, साथ-साथ नहीं चल सकता । हमें किसी एक को चुनना होगा । मैं राष्ट्रीय राजधानी का दर्जा पसन्द करूँगा ।

(लेखक के यह विचार पूर्णत: व्यक्तिगत हैं।)

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5 replies »

  1. दिल्ली मे दिल्ली वालो की ही राय होना चाहिए चूकि मेै दिल्ली का नही हूं राय न दे कर सुझाव दे रहा हूं दिल्ली मे विधानसभा को खत्म कर देना चाहिए , केवल महानगर निगम होना चाहिए वो भी कम से कम जनसंख्या के आधार पर हर केन्द्र शासित जगहा पर एक अलग से केन्द्री मंत्रालय होना चाहिए , केन्द्र सरकार को ही हर केन्द्र शासित जगहा को शासित करना ही उचित है

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  2. full statehood,apart from being an emotive issue, has serious cosequences. Dili a city-state in its present form needs better coordination among multitude of authorities. a landlocked city-state with no resources, natural or othrrwise, of its own cannot afford to b a full state. challenges are galore and keep piling up by the day and nothing in sight to suggest corresponding increase in financial resources on it own. out of the box thinking to address its problems. after AAP experiment any govt at the centre and even Parliament will shudder with fear on mere thought of full statehood to Dili. Dili is privileged in its current form and continue to b privileged simply because it is Dili which fulfils many dreams.

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