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राहुल जी के नेतृत्व में किसान संघर्ष सफल-अन्नदाता सुखी भवः

द्वारा: अजय माकन]अध्यक्ष] दि0प्र0क0कमेटी

व्यक्तिगत विचार

 

किसान संघर्ष सफल: अन्नदाता सुखी भवः।

 

कांग्रेस पार्टी ने हमेशा से किसानों के हितों के लिए कार्य किया है और उनके हितों की लड़ाई समय-समय पर संसद के बाहर व भीतर भी लड़ी है। मुख्यतः 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून की नींव कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी द्वारा गौतमबुद्ध नगर के गांव भट्टा पारसौल के किसान संघर्ष में रखी गई जब श्री राहुल गांधी ने किसानों से जबरन उनकी जमीन अधीग्रहित करने के खिलाफ आंदोलन किया व उनकी लड़ाई लड़ी। श्री राहुल गांधी ने किसानों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि ^^मैं आपको बताना चाहता हूW कि मैं आपके साथ हूW] जब तक आपकी मांगे पूरी नहीं हो जाती। कांग्रेस पार्टी आपका साथ नहीं छोड़ेगी] जब तक आपका कार्य पूरा नहीं होता।**  

 

श्री राहुल गांधी ने अखिल भारतीय स्तर पर किसानों की समस्याऐं सुनी और उनके निदान के लिए प्रयास करने शुरु कर दिए। श्री राहुल गांधी जी के विशेष प्रयासों के कारण ही कांग्रेस की अगुवाई वाली यू.पी.ए.-2 को नए भूमि अधिग्रहण कानून लाने के लिए सोचना पड़ा। कांग्रेस पार्टी में इस विषय पर गहन चिंतन व मनन हुआ और विपक्ष के सुझाव नए कानून में सम्मलित करते हुए ^^द राइट टू फेयर कम्पेन्सेशन एंड ट्रांसप्रेन्सी इन लैंड एक्विजिशन] रिहेबिलिटेशन एंड रिसेटलमेन्ट एक्ट-2013^^ बनाया गया। जिसने भूमि अधिग्रहण के 119 वर्षो से चले आ रहे ब्रिटिश रुल के दौरान बनाऐ गए कानून जो कि 1894 में बनाया गया था हालांकि इस कानून में समय-समय पर बदलाव होते गए परंतु फिर भी यह कानून किसानों के हितों की पूरी तरह रक्षा नहीं कर पा रहा था इसलिए कांग्रेस की यूपीए सरकार ने किसानों के हितों को ध्यान में रखतें हुए नया कानून लाकर ब्रिटिश कानून को बदल दिया गया। ज्ञात हो कि आधुनिक भारत में भूमि अधिग्रहण का इतिहास 1824 के बंगाल कोड रेगुलेशन-1 से शुरु होता है जिसमें ब्रिटिश सरकार ने नमक बनाने वाले उद्योगपतियों के लिए भूमि अधिग्रहित की थी।

 

यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है जब किसी भी कानून को बनाने से पहले उसके सामाजिक] आर्थिक व मानवीय पहलुओं का अध्ययन किया गया। यह एक ऐसा दस्तावेज है जो आर्थिक व सामाजिक न्याय की अवधारणा को पूरा करता है। इस कानून के सामाजिक] आर्थिक] पारदर्शिता व मानवीय पहलुओं को समझने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून-2013 की विभिन्न धाराओं का अध्ययन करना जरुरी है।

 

इस कानून की धारा 4 के अनुसार भूमि अधिग्रहण करने से पहले उस क्षेत्र के सामाजिक पहलुओं के प्रभावों का आंकलन करना जरुरी है जिससे कि वहां के किसानों व प्रभावित होने वाले परिवारों की स्थिति का जायजा लिया जा सके और लोक प्रयोजन का जायज़ा लिया जा सके। इस कानून की धारा 7 के तहत एक विशेषज्ञ समूह के द्वारा सोशल इम्पेक्ट असेस्मेन्ट रिपोर्ट का आंकलन किया जाना भी जरुरी है तथा विशेषज्ञ समूह में 2 सोशल वैज्ञानिक] 2 पंचायत ग्राम सभा] नगरपालिका या नगर निगम के 2 प्रतिनिधि] 2 पुनर्वास विशेषज्ञ तथा परियोजना से सम्बन्धित 1 तकनीकी विशेषज्ञ होना चाहिए। इस कानून के तहत धारा 10 के अनुसार खाद्य सुरक्षा के लिए भी आवश्यक उपाय किए गए हैं तथा धारा 10(3) में यह प्रावधान किया गया है कि जब बहु-फसलीय सिंचित भूमि का अधिग्रहण किया जाता है तब खेती योग्य बंजर भूमि के समान क्षेत्र को कृषि के प्रयोजनो के लिए विकसित किया जायेगा या अधिग्रहित भूमि के मूल्य के बराबर रकम खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए कृषि कार्य के लिए निवेश की जाऐगी। इस कानून की अन्य धारा 31 में विस्थापित किसानों के पुनर्वास हेतू विशेष प्रावधान रखे गए हैं उदाहरण के लिए प्रभावित परिवारों में से प्रत्येक के एक सदस्य को रोजगार तक देने प्रावधान किया गया है। विस्थापितों के पुनर्वास को सुनिश्चित करने हेतू धारा 48 में एक राष्ट्रीय माWनिटरिंग कमेटी के निर्माण की विशेष व्यवस्था भी की गई है।

 

इस कानून के तहत बड़े उद्योगपतियों व कार्पोरेट द्वारा विकास के नाम पर किसानों को जबरदस्ती उजाड़ने की प्रक्रिया को रोका गया व भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता व किसानों की सहमति को जोड़ा गया। इस कानून में किसानों] दलितों व आदिवासियों का विशेष ख्याल रखा गया और साथ ही जिला अधिकारी की डिशक्रिश्नरी पावर्स को भी समाप्त कर दिया। भूमि अधिग्रहण कानून के तहत यदि प्राईवेट प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहित की जाती है तो 80 प्रतिशत भूमि मालिकों की सहमति जरुरी है और यदि पब्लिक-प्राईवेट प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहित होती है तो 70 प्रतिशत भू-स्वामियों की सहमति जरुरी है।

 

भा.ज.पा. की मोदी सरकार ने 2014 में कमान संभालने के बाद सबसे पहला कार्य यू.पी.ए. द्वारा बनाऐ गए किसानों के हितों के भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में कुछ संशोधन कर किसानों के हितों के कानून की हत्या करने की भरसक कोशिश की गई और उद्योगपतियों को फायदा पहुaचाने के लिए 2013 के कानून की धारा 1बी (i )] धारा 24 (2)] धारा 87 व धारा 101 में संशोधन करने व धारा 10ए को जोड़ने हेतू एक अध्यादेश जारी किया गया तथा बड़े आश्चर्य की बात है कि इस अध्यादेश को 3 बार लाया गया और दो बार संसद में उपरोक्त संशोधनों को पास कराने हेतू बिल लाया गया। परंतु कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी व उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने किसानों के हितों की रक्षा के लिए इस बिल का विरोध किया जिसका परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार को यह बिल वापस लेना पड़ा। कांग्रेस पार्टी ने श्रीमती सोनिया गांधी व श्री राहुल गांधी के कुशल नेतृत्व में देश के अन्नदाता किसानों की लड़ाई को पूरे देश में जारी रखा] नतीजन उद्योगपतियों की कठपुतली सरकार को किसानों के सामने झुकना पड़ा और कांग्रेस किसानों के हितो की लड़ाई जीतने में सफल रही।

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