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केजरीवाल जबाव दें?  क्या “आप पार्टी” के द्वारा प्रस्तावित लोकपाल “सरकारी लोकपाल” नहीं हैं?

केजरीवाल जबाव दें?  क्या “आप पार्टी” के द्वारा प्रस्तावित लोकपाल “सरकारी लोकपाल” नहीं हैं?

  

   
लोकपाल के चयन में मुख्यमंत्री एवं उन्हीं की पार्टी के विधानसभा अध्यक्ष तथा राजनेताओं की ही चलेगी – सर्च कमेटी समाप्त ।

 

➢ 2014 के जनलोकपाल बिल के अनुच्छेद 5 में यह प्रावधान था कि सर्च कमेटी के जरिए लोकपाल व उसके सदस्यों के बारे में जनता की राय ली जायेगी। जबकि 2015 के लोकपाल कानून से सर्च कमेटी के प्रावधान को ही हटा दिया गया है। 2015 के जनलोकपाल में मुख्यमंत्री व विधानसभा अध्यक्ष, लोकपाल व उसके सदस्यों की चयन की प्रक्रिया में हावी रहेंगे। यह इस बात को दर्शाता है कि जनलोकपाल जैसी स्वतंत्र संस्था की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप को बढ़ा दिया गया है। जबकि केजरीवाल जी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त लोकपाल की बात किया करते थे।

 

लोकपाल को हटाने की शक्ति सत्ताधारी विधायकों के ही हाथ में।

 

➢ 2014 के प्रस्तावित जनलोकपाल के अनुच्छेद 22 (1) के अनुसार दिल्ली उच्च न्यायालय की जांच के बाद किसी भी व्यक्ति की शिकायत पर चैयरपरसन और उसके सदस्यों को राष्ट्रपति जी के द्वारा हटाये जाने का प्रावधान था। परंतु 2015 के बिल में अनुच्छेद 6 (1) के अनुसार विधानसभा सदस्यों की शिकायत पर सदन में उपस्थित सदस्यों के बहुमत या दो तिहाई विधायकों की सहमति से लोकपाल को हटाया जा सकेगा। जबकि केंन्द्र की यू.पी.ए. सरकार द्वारा गठित लोकपाल को लोकसभा एवं राज्यसभा के कुल 790 सांसदों में से 100 सांसद जिसमें विपक्षी पार्टियों के सांसद भी हो सकते हैं उनकी महामहिम राष्ट्रपति जी को भेजी शिकायत पर सर्वोच्च न्यायालय को ही हटाने का अधिकार है।

 

जांच अधिकारी (I.O.) को सरकार की सहमति से ही लोकपाल के आधीन लाया जायेगा तथा लोकपाल का कोई अपना जांच विभाग नहीं होगा।

 

➢ 2014 के बिल के अनुच्छेद 12 (1) के अनुसार लोकपाल जांच इंकाई का गठन करके भ्रष्टाचार से संबधित जांच करा सकता था। जबकि 2015 के अनुच्छेद 10 (1) के अनुसार लोकपाल सरकार की सहमति से जांच अधिकारी की नियुक्ति एवं जांच संस्थाओं द्वारा उसके आधीन आने वाले अपराधों की जांच करवा सकता है।

➢ लोकपाल को बनाने, हटाने एवं जांच अधिकारी (I.O.) को लाने, सभी के अधिकार मुख्यमंत्री एवं सत्ताधारी पार्टी के विधायकों के ही हाथ में है।

कहां है केजरीवाल का स्वतंत्र व निष्पक्ष लोकपाल?

इस बिल में मुख्यमंत्री, मंत्री, एवं विधायक का कोई जिक्र ही नहीं है। जनसेवक (पब्लिक सर्वेन्ट) की परिभाषा ही समाप्त।

 

➢ 2014 के जनलोकपाल बिल की तुलना में 2015 के बिल मे जनसेवक (पब्लिक सर्वेन्ट) की परिभाषा को ही निकाल दिया, जबकि 2014 के बिल के अनुच्छेद 17 में जनसेवक (पब्लिक सर्वेन्ट) की परिभाषा थी जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्री व विधायक आते थे। ऐसा इसलिए किया गया ताकि फर्जी डिग्री, धोखाधड़ी व जमीन हड़पने वाले (तौमर, मनोज व आसीम) जैसे भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) के अन्तर्गत आने वाले अपराधों मे लिप्त विधायकों की जांच लोकपाल द्वारा ना हो सके?

 

भ्रष्ट विधायकों को अब निलंबित नहीं कर सकता लोकपाल।

 

➢ 2015 जनलोकपाल कानून के अनुच्छेद 15 में भ्रष्ट लोकसेवकों (पब्लिक सर्वेन्ट) व सरकारी बाबुओं के निलम्बन की सिफारिश कर सकता है परन्तु भ्रष्ट विधायकों को निलंबित करने का अधिकार उसके पास नहीं है।

➢ ठीक इसके विपरित, केजरीवाल जी ने जो कानून 2014 में प्रस्तावित किया था, उसमें लोकपाल को भ्रष्ट विधायकों को निलंबित करने का अधिकार था।

 

शिकायतकर्ता की सुरक्षा कौन करेगा?

➢ विसलब्लोर (शिकायतकर्ता) की परिभाषा के दायरे से आर.टी.आई. कार्यकर्ता एवं गवाह को क्यों निकाल दिया गया?, क्या इससे दिल्ली में, मध्य प्रदेश में घटित व्यापम केस मंे हुई सैकड़ो गवाहों की मौतों जैसी घटनाऐं घटित नहीं होंगी?

➢ 2014 के जनलोकपाल बिल के अनुसार शिकायतकर्ता को धमकी मिलने पर शिकायत के 15 दिन के अन्दर सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान था तथा उससे सम्बंधित जांच को 3 महीनों मे पूरा करना था। जबकि 2015 के बिल मे शिकायत की जांच के लिए निश्चित समय अवधि तय नहीं है। इससे शिकायतकर्ता की अप्रत्यक्ष रूप से प्रताडना होगी।

 

शिकायत गलत पायी जाने पर शिकायतकर्ता को एक साल की सख्त सजा।

➢ जब तक केजरीवाल सत्ता में नहीं आये थे तो बड़ी जोर से कहते थे की शिकायतकर्ता की तरफ सरकार का तर्क सद्भावी होना चाहिए!

➢ 2014 से 2015 में केजरीवाल जी ने लोकपाल कानून का संशोधन करते हुए शिकायतकर्ताओं के खिलाफ सजा की धारा और सख्त कर दी हैं। 2015 के लोकपाल कानून के अनुच्छेद 9 (2) अंतर्गत उसे अब अगर शिकायतकर्ता की शिकायत पर मामला नहीं बना तो एक साल की कठोर सजा तथा जुर्माना देना पड़ेगा।

 

सरकारी विभाग के खिलाफ शिकायत अब संभव नहीं (सिटिजन चार्टर)

➢ 2014 के बिल के अनुच्छेद 30 में सीटिजन चार्टर बनाने का प्रावधान था जिससे अगर कोई सरकारी कर्मचारी, लोगो के प्रति, अपने विभाग की जिम्मेदारी नहीं निभाता या आम जनता को सरकारी सेवा प्रदान करने में परेशान करता है तो उसके खिलाफ लोकपाल उचित करवाई करने में सक्षम होगा। यह प्रावधान 2015 के कानून से केजरीवाल सरकार ने पूर्ण रूप से निकाल दिया है। जबकि 15 दिसम्बर 2013 को केजरीवाल जी ने केन्द्र के लोकपाल में सिटिजन चार्टर को शामिल न करने पर उसे जोकपाल की संज्ञा दी थी परंतु आज अपने द्वारा लाये हुए लोकपाल में सिटीजन चार्टर को शामिल नहीं किया गया।

इससे केजरीवाल का दोहरा चरित्र उजागर होता है।

 

जब चाहे जांच बंद।

➢ 2015 के लोकपाल कानून में एक अनोखा प्रावधान किया गया है कि अब लोकपाल अनुच्छेद 17 के अन्र्तगत किसी भी केस में बिना वजह बताये कार्यवाही रोक सकता है।

एक तो लोकपाल सरकारी ऊपर से न कोई उसकी जवाबदेही।

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1 reply »

  1. respected sir u make the delhilites to understand this lokpal act in very simple language and by highlighting the point of difference b/w 2014 &2015 lokpal acts respectively.

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