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क्या श्री अरुण जेटली ने खेलों में पारदर्शिता का विरोध नही किया था?

  

क्या अरुण जेटली ने खेलों में पारदर्शिता का विरोध नही किया था?

 

2010 के कामनवेल्थ खेलों के बाद जनवरी 2011 में मुझे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर खेल मंत्रालय का जिम्मा दिया गया जहां पर खेलों में उच्च स्तर की पारदर्शिता और स्पोर्टस फेडरेशनस के टॉप मेनेजमेन्ट में जिम्मेदारी तय करने की मांग थी।

 

यह वह समय था जिस समय 2010 के कामनवेल्थ खेलों को लेकर कई आरोप लगाऐ गए थे जिसका केन्द्र बिंदू हमारी पार्टी के मजबूत सांसद सुरेश कलमाड़ी थे परंतु मेरे खेल मंत्री बनने के 3 दिनों के भीतर ही मैंने इस मामले में बिना किसी अवरोध के जांच के लिए सबसे पहले कामनवेल्थ खेलों की आयोजन समिति से सुरेश कलमाड़ी को हटाया। पहले महीने के कार्यकाल में ही मैंने कलमाड़ी के खिलाफ सी.बी.आई. जांच को प्रस्तावित किया तथा मेरे निर्णय का पार्टी हाई कमान ने भी समर्थन किया जिसके कारण श्री कलमाड़ी को जेल जाना पड़ा।  

 

बीसीसीआई को सूचना के अधिकार (आर.टी.आई) के अन्तर्गत लाने का प्रयास

 

मेरे खेल मंत्री के कार्यकाल के दौरान मैं खेल संस्थाओं को सूचना के अधिकार (आर.टी.आई.) के अधिकार क्षेत्र में लाना चाहता था। मेरे इस प्रोपोजल के कारण कई महत्वपूर्ण लोग जो कि दशकों से खेल संस्थाओं को अपने मनमाने ढंग से चला रहे थे वे परेशान हुए। इन संस्थाओं में खेलों में वरियता, वित्तिय तथा प्रबंधकीय पारदर्शिता को खेल के ठेकेदारों द्वारा बिलकुल भी तव्वजों नही दी जाती थी। अरुण जेटली तथा दूसरे लोग ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थो व कारणों के चलते खेलों में पारदर्शिता का विरोध किया। अरुण जेटली डीडीसीए के महत्वपूर्ण अध्यक्ष पद पर 1999 से 2013 तक रहे।

 

मैंने अपने खेल मंत्री के कार्यकाल में खेलों में तानाशाही को खत्म करने के लिए केन्द्रीय सूचना आयुक्त को प्रस्तावित करके बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के अन्तर्गत लाने के लिए कहा था जिसके लिए हमने केन्द्रीय सूचना आयुक्त के सामने 20 दिसम्बर 2011 को एक शपथ पत्र भी दिया था। हमने बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के अन्तर्गत लाने के लिए इसलिए कहा था क्योंकि यहां पर अप्रत्यक्ष रुप से पैसा आता है तथा कस्टमस्/टैक्स में छूट, खेलों के स्टेडियम के लिए छूट दर पर जमीन ली जाती है।

 

फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के निमार्ण में हुई अनियमितताओं का पर्दाफाश ।

 

मैं यह बताना चाहता हूँ कि मेरे खेल मंत्री के कार्यकाल में डीडीसीए के सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने सितम्बर 2012 में मेरे संज्ञान में डीडीसीए में हो रहे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को लाया और मैंने भ्रष्टाचार की आवाज उठाने वाले लोगों की उपस्थिति में कार्पोरेट अफेयर्स मंत्री के संज्ञान में इस विषय को लाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि कार्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय के अन्तर्गत आने वाले रजिस्ट्रार्स ऑफ़ कम्पनीज (आर.ओ.सी) ने 28/9/2012 को डीडीसीए में अनियमितताओं को लेकर एक जांच की। आर.ओ.सी. की रिपोर्ट तथा सीरियस फ्रोड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एस.एफ.आई.ओ.) ने उजागर किया कि अरुण जेटली के अध्यक्ष रहते हुए डीडीसीए में बहुत गहरे वित्तिय घपले हुए है। एस.एफ.आई.ओ. की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के निर्माण के लिए 90 करोड़ रुपया बढ़ाकर खर्च किया गया। 50 करोड़ से ज्यादा के भुगतान बिना किसी टेन्डर को जारी किए गए। जबकि डीडीसीए जांच एजेन्सी के सामने किसी भी प्रकार का स्पष्टीकरण देने में नाकामयाब रही।

 

फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में बहुत सारे कार्पोरेट बाक्सेस का निर्माण बड़े लोगों के लिए हुआ और उनको बिना किसी पारदर्शी टेन्डर प्रक्रिया के बहुत कम राशि में अपने दोस्तो को सब-लीज़ पर दे दिया गया। ऐसे आरोप है कि यह सब डीडीसीए के अध्यक्ष की रजामंदी से हुआ। यह भी नोट करने वाली बात है कि ये सब घोटाला डीडीसीए द्वारा उस विशेष जमीन पर हो रहा था जिसको कि सरकार ने एक तरह से मुफ्त में दिया था। 7/8/2015 को एक अतारांकित प्रश्न के जवाब में वर्तमान सरकार के राज्य मंत्री ने जवाब दिया कि कार्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय के आदेश पर 28/9/2012 को आर.ओ.सी. ने डीडीसीए का इन्सपेक्शन किया था और डीडीसीए के चार अधिकारियों सुनील देव, नरेन्द्र बत्रा, एस.पी. बंसल तथा सी.के. खन्ना को अनियमितताओं में लिप्त पाने के आरोप थे।  

 

क्या जेटली जांच से डरते है।

 

यह भी आरोप है कि डीडीसीए ने 9 कम्पनियों को काफी मात्रा में भुगतान किए थे, जांच में जिनको बेनामी पाया गया। जिनका एक जैसा रजिस्टर्ड आफिस, ईमेल आई.डी. तथा एक जैसे निदेशक थे। यह कम्पनियां फर्जी बिल देने के लिए बनाई गई तथा डीडीसीए ने इनको एक भारी रकम का भुगतान भी किया।

 

इन सबको सही मानते हुए कम्पनी लॉ बोर्ड ने अपने 9/5/2015 के आर्डर में कहा था कि ‘‘रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज़, दिल्ली एंड हरियाणा ने अपनी 15/7/2014 की रिपोर्ट में यह कहा था कि एसोसिएशन ने अपने 2008-2009, 2009-2010, 2010-2011 तथा 2011-2012 के वित्तिय वर्ष की बैलेंस शीट के नोट्स ऑफ़ एकाउन्टस में संबधित पार्टियों के नाम तथा लेन-देन का ब्यौरा नहीं दिया है। इसलिए कानून की धारा 211 (3एओ एंड 3सी) का उलंघन है ….. ’’ यहां यह बताना बहुत महत्वपूर्ण है कि इन बैलेंस शीट पर डीडीसीए का अध्यक्ष रहते हुए अरुण जेटली ने हस्ताक्षर किए होंगे।

 

कैसे अरुण जेटली तथा अन्य लोगों ने राजनीति व क्रिकेट को आपस में जोड़ दिया।

 

अब अरुण जेटली के डिफेंस पर आते है, केन्द्रीय वित्त मंत्री ने 17 नवम्बर 2015 को एक वक्तव्य जारी किया कि एस.एफ.आई.ओ. ने यूपीए के कार्यकाल में उनको ‘‘क्लीन चीट’’ दे दी थी। यहां पर इस भ्रम को ठीक करना बहुत जरुरी है क्योंकि एस.एफ.आई.ओ. जो कि कार्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय का एक जांच विभाग है जो सिर्फ गंभीर ‘‘कार्पोरेट घोटालों’’ की जांच करता है। इसके बाद किसी भी व्यक्ति की संलिप्ता की जांच सी.बी.आई. तथा ई.डी. जैसी एजेन्सियां करती है। इस केस में सी.बी.आई ने पहले ही 28/10/2015 को अपनी जांच शुरु कर दी है। मुझे कानून की बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं है परंतु जो थोडी बहुत कानूनी जानकारी है उसके अनुसार मैं जेटली जी को यह याद दिलाना चाहता हूँ कि एक व्यवस्थित कानूनी सिंद्धांत है “No man shall be a judge in his own cause” (कोई भी व्यक्ति अपने केस में खुद जज नहीं हो सकता) इसलिए सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता बनाऐ रखने के लिए उनको वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए क्योंकि उनके अन्तर्गत आई.टी., ईडी, एस.एफ.आई.ओ. जैसी जांच एजेन्सियां बतौर वित्त मंत्री आती है। उनको इस्तीफा इसलिए देना चाहिए ताकि इस मामले में पारदर्शी व निष्पक्ष जांच हो सके। वैसे जेटली ने इन आरोपों को मात्र तकनीकी अनियमितताओं का नाम दिया है। मैं उनका ध्यान माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 31/1/2011 के फैंसले जो कि उन्होंने टी.सी.मैथ्यू बनाम के. बालाजी अयंगार व अन्य में दिया था, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा था कि क्रिकेट एसोसिऐशन के पदाधिकारी ‘‘पब्लिक सर्वेन्ट’’ होते है जो कि ‘‘प्रीवेन्शन ऑफ़ करप्शन एक्ट’’ के दायरे में आते है। इसलिए जेटली को यह सलाह दी जाती है कि वे डीडीसीए में हुई वित्तिय अनियमितताओं को हल्के में लेकर नजरअंदाज न करें।  

 

केन्द्र में बैठी भा.ज.पा. वर्तमान में इस मामले में जो भी स्पष्टीकरण दे रही है, मैं उनको यह याद दिलाना चाहता हूँ कि जिस पार्टी ने भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर लोगों की वोट ली थी। हालांकि कलमाड़ी के खिलाफ शुरु में पैसे को लेकर कुछ नहीं मिला था परंतु फिर भी कांग्रेस पार्टी ने उनको पद से हटा दिया ताकि उनके उपर अनियमितताओं के आरोपों की जांच पारदर्शी रुप में हो सके। इसी प्रकार महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक चव्हान तथा पूर्व रेल मंत्री श्री पंवन बंसल को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था ताकि उनके खिलाफ आरोपों की निष्पक्ष जांच हो सके।

 

मैं उम्मीद करता हूँ कि भा.ज.पा. यदि अपने चुनाव घोषणा पत्र को भूल गई है तो वह अपनी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार से सबक ले सकती है।    

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